हम बदहाल हैं : मौत के रूप में अब और कितने सबूत चाहिए !

received_1833310390020210      ♣ रक्सौल से मनीष सिंह ♣

ख़बरों की दुनिया के लिए आज रक्सौल के मेन रोड पर एक महिला व बच्चे की मौत सनसनी है .प्रशासन के लिए पोस्टमार्टम होने तक थोड़ी बहुत फजीहत का विषय . सड़क जाम में यात्रियों का कुछ देर के लिए बिलबिलाना . संवेदनशील लोगों को दो जान का एक साथ चले जाने का अफ़सोस .पर इससे इतर आज किसी की पत्नी , किसी की बहन , किसी की बेटी दुनिया से चली गयी .साथ में एक बच्चा अपनी आँखों से रक्सौलवासियों से यह पूछा रहा था कि अब इस नरक से निकलने  के लिए मेरे बाद किसकी बारी होगी ?
रक्सौल सच मानें तो कई मामलों में अलग तरह का शहर है . शहर के बीचोंबीच मेनरोड का होना तो ठीक है पर भारी वाहनों का लगातार  चलना क्या ठीक है .बाईपास का सपना शायद तब पूरा होगा जब हमारे बीच से आज ही की तरह कई लोग काल के गाल में समा जाएंगें .यहां जाम को महाजाम कहते – कहते हम थक गए .प्रशासन तो कभी जनप्रतिनिधियों को कोसते रहे .पर इससे क्या फायदा क्यों कि दोनों  प्रशासनिक अधिकारी हो यां जनप्रतिनिधि उन्हें आना है और जाना है कोई दो साल तो कोई पांच साल के लिए .पर हम तो लटके ही रह जाते है.वास्तव में दुर्घटनाएं हमारे वश की बात नहीं है .पर इसे कम अवश्य किया जा सकता है .ताजा घटना में कड़ी धूप थी , जाम से वाहनों की कतारें बढ़ गयीं , ट्रक चालकों को जाने की जल्दी और बस इसी परिस्थिति के शिकार बन गए दो रक्सौलवासी.
अब यहां की बिजली तार को हीं देखें .बर्षों , पुराने जर्जर व कामचलाऊ तार मौत के लिए काफी है .कई लोग इसकी चपेट में आये और दुनिया छोड़ गए .प्लास्टिक कोटेड तार तो लगें पर कहां कहां लगें कभी सिर उठाकर देख लें .शहर के बीच से रेल मार्ग के लिए दो गुमटी का निर्माण बहुत पहले हुआ. यहां जाम से सबसे अधिक तकलीफ डंकन अस्पताल आने जानेवालों को हो रही है .गुमटी के चक्कर में कई बच्चों का जन्म सड़क पर ही हो गया .तो कई तड़प तड़प कर संसार छोड़ गए .इस दर्द को बयां एक मां ही कर सकती है .
इन दिनों मेन रोड पर जो धूल उड़ने की स्थिति है इससे जान तो नहीं निकलेगी पर धीरे धीरे हार्ट व ब्रेन इसकी चपेट में आ जाएंगें और हमारा सुन्दर शरीर यहीं रह जायेगा .पूरे शहर में एक भी पार्क का नहीं होना हमारे लिए तो ठीक है पर आनेवाली पीढ़ी को हम कैसे समझायेंगें की बेटा इसी परिस्थिति में जीने की राह खोजनी होगी . नगर में कहीं भी यह नहीं लगता कि यहां कभी नगरपालिका भी था .हमारे गेस्ट हमसे अक्सर पूछते है कि यह शहर ऐसा क्यों है तो हमें जो शर्मिंदगी महसूस होती है उसे लिखा नहीं जा सकता .बस ,थोड़ी देर के लिए निराशा घेर लेती है पर हमें आज में ही जीना होगा .हमें पाजिटिव एनर्जी लानी होगी .किसी को आगे बढ़ना पड़ेगा .किसी को ईमानदार लीडर बनना ही पड़ेगा और फिर भी बात नहीं बनेगी तो दिल से हमें चंपारण की धरती पर एकबार फिर सत्याग्रह आन्दोलन को याद करना पड़ेगा .

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