शारदीय नवरात्र आज से शरू , सच्चे मन से करे मां की आराधना

kalash2_2015_10_14_124936मां दुर्गा को शक्ति की देवी माना जाता है। हमारे शास्त्रों में मां दुर्गा के विभिन्न नौ स्वरूप बताए गए हैं। इन्हीं नव स्वरूपों को वर्ष में दो बार पूजने के लिए नवरात्र का विधान बताया गया है। पहले नवरात्र हिंदू कैलेंडर के प्रथम मास यानी चैत्र मास आरंभ होते ही आयोजित किए जाते हैं। इसीलिए इन्हें चैत्र नवरात्र या वासन्तिक नवरात्र कहा जाता है। नौ दिनों तक मां दुर्गा का पूजन करने के बाद नौवें दिन रामनवमी आती है। ठीक यही प्रक्रिया वर्ष के उत्तरार्द्ध यानी शारदीय नवरात्र में भी अपनाई जाती है। आश्विन मास में आने के कारण इन्हें आश्विन नवरात्र या शारदीय नवरात्र कहा जाता है। फर्क केवल इतना ही होता है कि चैत्र नवरात्र के अंत में रामनवमी आती है और शारदीय नवरात्र के अंत में विजयदशमी का पर्व मनाया जाता है। नवरात्र को आद्या शक्ति की आराधना का सर्वश्रेष्ठ समय माना गया है। वैसे प्रत्येक हिंदू वर्ष यानी संवत्सर में चार नवरात्र होते हैं। चैत्र और आश्विन के अतिरिक्त आषाढ़ और माघ मास के शुक्ल पक्ष में भी नवरात्र होते हैं, किंतु इन्हें गुप्त नवरात्र कहा जाता है। इन गुप्त नवरात्र में तांत्रिक लोग मां दुर्गा की आराधना करते हैं। नवरात्र के नौ दिनों में प्रतिदिन एक शक्ति की पूजा का विधान है। नवरात्र के नौ दिनों में मां दुर्गा के शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री, इन नौ विभिन्न रूपों का विशेष पूजन, अर्चन और स्तवन किया जाता है।

घट स्थापना का समय : पहले नवरात्र पर प्रतिपदा के दिन घट स्थापना का विधान है। इस बार घट स्थापना का शुभ समय प्रात: 6:03 से लेकर 8:22 बजे तक है।
कलश स्थापना कैसे करें : इस दिन सबसे पहले प्रात:काल स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प करना चाहिए। फिर किसी साफ जगह पर गंगा जल की कुछ बूंदें डालकर उसे पवित्र करें और वेदी का निर्माण करें। वेदी पर लाल कपड़ा बिछाकर गणेशजी का ध्यान करते हुए कलश की स्थापना करें। उसके बाद ‘ओम् अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः’ इस मंत्र का उच्चारण करके स्वयं को शुद्ध कर लें। इसके बाद दाएं हाथ में अक्षत, फूल, और जल लेकर दुर्गा पूजन का संकल्प करें। संकल्प के लिए अपने देश, काल और गोत्र आदि का उच्चारण करके ‘मम इह जन्मनि श्रीदुर्गा प्रीति द्वारा सकलपापशांतिपूर्वकं दीर्घायु: विपुलधन पुत्र पौत्रादि अनवछिन्न संततिवृद्धि स्थिरलक्ष्मी कीर्तिलाभ-शत्रुपराजयादि सदभीष्ट-सिद्ध्यर्थं शारदीय-नवरात्र-प्रतिपदि विहितकलशस्थापन-दुर्गापूजनादिकं च करिष्ये’ इन पंक्तियों को उच्चारित करते हुए दुर्गापूजन का संकल्प करें। कलश में पवित्र जल भरकर उसके मुख पर पंच पल्लव रखें। फिर चंदन, पुष्प आदि सुगंधित द्रव्यों को मिलाकर कलश में डालें। कलश पर सूत्र बांधें। उसके बाद कलश के मुख पर चावल से भरा छोटा पात्र रखें और उसमें वरुण और मां दुर्गा की प्रतिमा रखकर उनका ध्यान करते हुए निम्न मंत्र से आवाहन करें और विधि विधान के साथ पूजा करें-
या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

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